हल्की फुल्की बातें

अनिद्रा से अफ़ेयर
कभी ना खत्म होता
अगर-
ना हुई होती
हम पर
झाड़फूँक
उस छायागीत की …

एक साल
कितना लंबा
होता है न…
कैसे काट लिया हमने
गंगा और गोमती में
कितना पानी बह गया न
और-
हम खड़े खड़े
राह में पड़े पड़े
वक्त के उतार का चढ़ाव देखते रहे…

कोई बात नहीं
हम
वही नहीं रहे
रूपांतरित हुआ
काफी कुछ
काफी सारे पत्ते झड़ गये
कुछेक नवपल्लव भी
अंकुरित हुए…

चलो
आगे बढ़ते हैं
एक कदम और
अपनी यायावरी की दुनिया में
एक अज्ञात की तरफ़
जो छुपा है
मेरे ही मेघ मल्हार की ओट में
ये ओट भी न
कितनी भली लगती है…

चलो…
अभी छोड़ते हैं
ये सब भारी भारी
गुरू गंभीर
सूफियाना दर्शन की बातें
और करते हैं
कुछ हल्की फुल्की बातें
थोड़ा
जी हल्का करने के लिए…

“ये जो चिलमन है, दुश्मन है हमारी…!”

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