भाव-जगत के श्यामल मेघ

श्यामल_मेघ
सिर्फ़
गगनाच्छादित
नहीं होते…
वो
अंतर आकाश में भी
उमड़ते घुमड़ते हैं
और जब
भावनाओं की आर्द्रता
पहुँच जाती है
अपने क्रांतिक बिन्दु तक..
तो हो जाते हैं
चश्मेनम …!

और…
तब होता है
सही मायनों में
संगम
अंतर और वाह्य जगत में
गूँजते हुए
राग
मेघ मल्हार का…!

और
तब होता है
प्रत्यक्षबोध
इन
पंक्तियों में
अंतर्निहित
गूढ़ार्थ का—

“आज श्याम सपने में आए
भरि आए नैन..
ढुलक गयो कजरा …!”

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