मेघ मल्हार

मेरे ऊपर घिरी
घटाओं..!

अच्छा लग रहा है
तुम्हारा यह
चातुर्दिक विस्तार
बावज़ूद इस कम रोशनी के
धरा प्रमुदित है
पुष्पित और
पल्लवित हो रही है
आशाओं के नवांकुर फूट रहे है
और-
पुरातन अंकुर
बन कर तरू झूम रहे हैं…

देखो तो जरा
कौन आया है
मेरी छत के मुंडेर पर
बड़े हो चुके
शहतूत को देखने
एक छोटी सी बच्ची…
जो इस बेमौसम में मौज़ूद
शहतूतों को छूकर
खुशी से उछल रही है
और यह सब
संभव हो सका है
तुम्हारे द्रवित होने से…😢

कौन जाने
तुम्हें पिघलाने में
शायद
रही हो भूमिका
मेरे नेत्रों में आच्छादित
राग #मेघ_मल्हार की…
जो होते रहते हैं
गुंजायमान
इन धीर शब्दों के द्वारा-
“अब कौन जतन राखूँ मन को..!”

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